उत्तराखंड की तीर्थ यात्रा
: तीर्थयात्रा का दूसरा दिन महज तफरीह के हिस्से में आया।
सुबह हरिद्वार से निकल कर देहरादून होते हुए,मसूरी।जी हां पहाड़ों की रानी मसूरी।
विख्यात कथाकार शिवानी जी ,सुमित्रानंदन पंत,मनोहर श्याम जोशी, रस्किन बांड और शैलेश मटियानी आदि लेखकों से,पहाड़ों के बारे में इतना सुन पढ़ रखा था कि,बरबस ही उन स्थानों को देखने का मन था, पहाड़ों की रानी मसूरी भी इन्ही लोगो द्वारा दिया गया सम्बोधन है।

तो हम मसूरी में एक शॉर्ट विजिट करते हुए,लाइब्रेरी चौक, गांधी प्रतिमा से होते हुए माल रोड से निकल गये।
साथी यात्रियों की रुचि,केमटी फाल को देखने मे थी,ऊपर से पानी भी गिर रहा था, तो फोटोज भी ढंग से नही आ पा रही थी।
केमटी फाल लगभग 4 हजार 500फुट ऊँचाई से गिरता हुआ झरना है जिसकी कई धाराएं नीचे गिरती हैं।
1835 में अंग्रेजों ने यहाँ टी कैम्प के रूप में स्थापित किया था।
झरना प्राकृतिक था, अग्रेजो ने बस नामकरण किया
इसके पूर्व कल हम लोगो ने यात्रा प्रारम्भ की,
हर की पौड़ी, हर का द्वार
हर या भगवान के मिलन का दरवाजा हरिद्वार।हर की पौड़ी अर्थात हर से मिलने जाने की सीढ़ी।

सर्वप्रथम गंगा स्नान
सहयात्री है दामाद ऋषिभूषण जी,भतीजी स्वाति,भतीजा सन्दीप, श्वेता संदीप देवलिया,नाती गण मेघ,वेद,श्रेय ,पौत्र देवव्रत, प्रियव्रत एवम श्रीमती सरोजरानी देवलिया